समूहन प्रभाव

यद्यपि, एसटीपीआई केन्द्रों की स्थापना देश में 52 स्थानों पर हो चुकी है, लेकिन उद्योग सघनता प्रमुखता से बंगलूरू, नोएडा, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में है। यह प्रौद्योगिकी समूहन के अन्य स्थलों, जैसे सिलिकन वैली, बोस्टन, डलास, आयरलैंड, स्वीडन और टोक्यो की तरह ही प्राकृतिक प्रौद्योगिकी समूहन प्रभाव को प्रतिबिंबित करता है।

प्रथम चरणः 1991-92 में, बहुत ही कम भारतीय कंपनियां भारत से सॉफ्टवेयर निर्यात में थीं। उस दौरन जो कंपनियां सॉफ्टवेयर निर्यात में थीं, उसमें टेक्सासइंस्ट्रूमेंट्स, ह्यूलेट पैकर्ड और डिजिटल जैसी कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल थीं। इसे विकास प्रक्रिया के पहले चरण का नाम दिया जा सकता है।

दूसरा चरणः विकास प्रक्रिया के दूसरे चरण में "अपतटीय विकास कार्य"  की अवधारणा ने जन्म लिया।विकास का दूसरा चरण जो 1993 में शुरू हुआ, 1998-99 में भारत और विशेष कर बंगलूरू को बहुत ऊंचाई तक ले गया।

मार्च 2001 के अंत तक,  सॉफ्टवेयर निर्यात में उद्योग 380 बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आधार स्थापना के साथ 5.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ गया। आईसी परिकल्पना, संचार सॉफ्टवेयर और सिस्टम सॉफ्टवेयर जैसे उच्च तकनीक क्षेत्र के सभी वैश्विक नेताओं ने भारत में अपने परिचालन के लिए आधार की स्थापना की।

तीसरा चरण: दूसरे चरण की सफलता ने विकास के तीसरे चरण के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। विकास के तीसरे चरण में सिलिकन वैली की नई कंपनियों के साथ बहुत घनिष्ठ और अंतरंग संबंध बने। वास्तव में, सिलिकन वैली की हर छोटी नई उच्च प्रौद्योगिकी कंपनी, जिसकी हैसियत अमेरिकी बाजार में लाखों डॉलर में थी, ने बंगलूरू में विकास केंद्र स्थापित करना शुरू कर दिया।

चौथा चरणः विकास के चौथे चरण के दौरान कई भारतीय कंपनियों ने भारत में बौद्धिक संपत्ति अर्जन और वैश्विक खिलाड़ियों से रॉयल्टी कमाना शुरू कर दिया।